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आज विराजेंगे बप्पा.. गणपति पूजा में मुहूर्त, पूजन-विधान, मूर्ति चयन और वस्त्र का विशेष महत्व.. बप्पा को भूलकर भी ये न करें अर्पित.. जानिए पूजा विधि की पूरी जानकारी..

गणपति उत्सव 10 दिनों तक चलता है और इस बार 5 सितंबर (अनंत चतुर्दशी) को बप्पा का विसर्जन किया जाएगा..

डेस्क/बिलासपुर– आज 27 अगस्त को पूरे देशभर में गणेश चतुर्थी का पर्व बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है.. गली-गली और घर-घर में बप्पा का स्वागत किया जा रहा है, लोग विघ्नहर्ता गणपति को प्रसन्न करने के लिए विधि-विधान से स्थापना और पूजन कर रहे हैं, यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोक परंपरा और परिवारिक एकता का भी उत्सव है..

गणेश चतुर्थी का महत्व..

गणेश चतुर्थी को विघ्नहर्ता गणपति के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, धार्मिक मान्यता है कि, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र गणेश का जन्म इसी दिन हुआ था.. वे बुद्धि, विवेक, सफलता और समृद्धि के देवता माने जाते हैं, यही कारण है कि, किसी भी शुभ कार्य या पूजा की शुरुआत ‘श्री गणेशाय नमः’ से की जाती है.. आस्था है कि इस दिन गणेश जी की पूजा करने से जीवन में आने वाली सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है..

गणेश जी की स्थापना का शुभ मुहूर्त..

पंडितों और पंचांगों के अनुसार इस बार गणेश स्थापना के लिए कई शुभ समय उपलब्ध हैं।

सिंह लग्न- प्रातःकालीन मुहूर्त: सुबह 7.15 तक

वृश्चिक लग्न- सुबह 11.37 बजे से दोपहर 1.52 बजे तक

कुंभ लग्न- सायंकालीन मुहूर्त: 05:46 बजे से 07:21 बजे तक

वृषभ लग्न- रात 10.35 से मध्यरात्रि 12.34 तक

इन समयावधियों को प्रतिमा स्थापना और पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना गया है..

गणेश जी को कौन-से रंग का वस्त्र प्रिय है?

धार्मिक शास्त्रों और मान्यताओं में गणेश जी को विशेष रूप से लाल और पीले रंग का वस्त्र प्रिय बताया गया है।

लाल वस्त्र: शक्ति, पराक्रम और मंगल का प्रतीक..

पीला वस्त्र: ज्ञान, समृद्धि और पवित्रता का प्रतीक..

इसलिए गणेश स्थापना के दौरान गणपति को लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनाना विशेष फलदायी माना जाता है..

मूर्ति स्थापना के नियम और विधि..

मूर्ति चयन में भी शास्त्रों और परंपराओं का विशेष महत्व है..

सूंड की दिशा – घर में दाहिनी ओर मुड़ी हुई सूंड वाली गणेश प्रतिमा रखना उत्तम है, यह समृद्धि और सफलता का प्रतीक है, वहीं, व्यवसायिक स्थान पर बाईं ओर मुड़ी सूंड वाली प्रतिमा रखना शुभ होता है..

मूर्ति की मुद्रा – बैठे हुए गणेश जी की प्रतिमा को सबसे शुभ माना गया है, यह मुद्रा शांति, स्थिरता और सुख-समृद्धि का संकेत देती है..

मूर्ति की सामग्री – पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए मिट्टी की मूर्ति को श्रेष्ठ माना जाता है, मिट्टी की प्रतिमा जल में आसानी से विसर्जित होती है और प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाती..

पूजा-विधान और नियम..

गणेश चतुर्थी की पूजा में नियमों और परंपराओं का पालन आवश्यक है..

प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें,

पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके गणेश प्रतिमा स्थापित करें..

सबसे पहले कलश स्थापना करें और उसमें जल, सुपारी, सिक्का, आम्रपल्लव और नारियल रखें..

गणपति जी को सिंदूर, अक्षत, दूर्वा घास और लाल-पीले फूल अर्पित करें..

मोदक, लड्डू, गुड़ और नारियल का भोग लगाएं। मोदक को गणेश जी का प्रिय माना जाता है..

धूप-दीप प्रज्वलित कर ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र का 108 बार जाप करें..

परिवार सहित आरती करें और प्रसाद का वितरण करें..

गणेश पूजा के दौरान विशेष ध्यान रखें..

दूर्वा (घास) की 21 पत्तियां अर्पित करना अनिवार्य माना जाता है..

गणेश जी को तुलसी पत्ते अर्पित न करें, क्योंकि तुलसी विवाह के कारण गणेश जी को अर्पित नहीं की जाती..

प्रतिमा को सीधे जमीन पर न रखें, बल्कि चौकी या लकड़ी के पट्टे पर लाल कपड़ा बिछाकर स्थापना करें..

गणेश चतुर्थी का सांस्कृतिक महत्व..

गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। देशभर में पंडालों की सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन-कीर्तन और सामूहिक आरती समाज को एकता और भाईचारे का संदेश देती है..

विसर्जन का दिन..

गणपति उत्सव 10 दिनों तक चलता है, इस बार 5 सितंबर (अनंत चतुर्दशी) को बप्पा का विसर्जन होगा.. लोग गणेश जी को धूमधाम से विदाई देंगे और अगले वर्ष पुनः आने का निमंत्रण देंगे – “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।”

गणेश चतुर्थी का पर्व भक्ति, आनंद और समर्पण का प्रतीक है, सही विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं.. गणपति की आराधना से न केवल व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मकता आती है, बल्कि समाज में भी उत्साह और भाईचारा बढ़ता है..

ग़णपति बप्पा मोरया, मंगल मूर्ति मोरया..

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