डिजिटल डिप्रेशन की ओर बढ़ते बच्चे.. मोबाइल में खोता बचपन, बच्चों की मानसिक सेहत पर मंडराता खतरा..
बच्चों में मोबाइल की लत कितनी है खतरनाक..

बिलासपुर/ डेस्क- मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप जैसी डिजिटल तकनीकों का बढ़ता इस्तेमाल अब बच्चों की मानसिक और सामाजिक सेहत पर बुरा असर डालने लगा है। कोरोना काल के दौरान शुरू हुई ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों को स्क्रीन से जोड़ा और अब यही आदत डिजिटल लत (डिजिटल एडिक्शन) में तब्दील हो रही है।
छत्तीसगढ़ सहित देशभर के स्कूलों में इस बात पर चिंता जताई जा रही है कि बच्चे पढ़ाई के अलावा भी घंटों मोबाइल चला रहे हैं। वीडियो गेम, सोशल मीडिया और ऑनलाइन वीडियो कंटेंट ने उन्हें वास्तविक दुनिया से काट दिया है।
आंकड़े जो चौंकाते हैं
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भारत में 10 से 18 वर्ष के हर 5 में से 3 बच्चे मोबाइल एडिक्शन से प्रभावित पाए गए हैं (WHO सर्वे, 2024)
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12 से 16 वर्ष के बच्चों में नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में गिरावट सामान्य बात बन चुकी है
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ग्रामीण स्कूलों में भी मोबाइल की पहुंच तेजी से बढ़ी है, जिससे बच्चों की पढ़ाई में रुकावट आ रही है
मनोचिकित्सकों की चेतावनी..
विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में:
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डिजिटल अवसाद (Digital Depression)
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घबराहट और अकेलापन (Anxiety & Isolation)
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वास्तविक जीवन में संवादहीनता
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और कभी-कभी गंभीर मानसिक विकार तक पनप सकते हैं।
स्कूलों की पहल: अब मोबाइल प्रतिबंध और डिजिटल डिटॉक्स पर जोर
छत्तीसगढ़ के कई निजी और सरकारी स्कूल अब बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल को स्कूल परिसर में प्रतिबंधित कर चुके हैं.. कुछ स्कूलों ने “डिजिटल डिटॉक्स डे” मनाना शुरू किया है, जहां एक दिन बच्चों को मोबाइल-फ्री एक्टिविटीज जैसे – मिट्टी कला, कहानी लेखन, संगीत आदि से जोड़ा जाता है..
माता-पिता की भूमिका अहम..
शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों की राय है कि अभिभावकों को भी बच्चों के साथ स्क्रीन टाइम सीमित करना चाहिए, और उन्हें खेलकूद, किताबों, और सामाजिक बातचीत की ओर प्रोत्साहित करना चाहिए।
तकनीक जरूरी है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग और नियंत्रण और भी जरूरी.. बचपन को स्क्रीन के पीछे से निकाल कर खुली हवा, खेल के मैदान और बातचीत की दुनिया में लाना अब समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गई है..



