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रूद्र चण्डी महायज्ञ एवं श्रीमद् देवी भागवत कथा श्री गणेश, भैरव एवं हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा हेतु अधिवास पूजा..

बिलासपुर– श्री पीतांबरा पीठ त्रिदेव मंदिर सुभाष चौक सरकंडा बिलासपुर छत्तीसगढ़ में चैत्र नवरात्र उत्सव  हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।इसी कड़ी में नवरात्रि के छठवे  दिन माँ श्री ब्रह्मशक्ति बगलामुखी देवी का पूजन श्रृंगार कात्यायनी देवी के रूप में किया गया एवं  प्रातः कालीन श्री शारदेश्वर पारदेश्वर महादेव का रुद्राभिषेक नमक चमक विधि के द्वारा किया गया तत्पश्चात रूद्र चण्डी महायज्ञ एवं दुर्गा सप्तशती पाठ देवघर झारखंड से पधारे यज्ञाचार्य गिरधारी वल्लभ झा के नेतृत्व में  विद्वानों के द्वारा निरंतर किया जा रहा है।
पीठाधीश्वर आचार्य डॉ दिनेश जी महाराज ने बताया कि 14 अप्रैल 2024, रविवार, चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी अधिवास-जलाधिवास, अन्नाधिवास, घृताधिवास, फलाधिवास, पुष्पाधिवास, शय्याधिवास किया गया।
15 अप्रैल 2024, सोमवार, चैत्र शुक्ल पक्ष सप्तमी प्राण प्रतिष्ठा – श्री गणेश जी, श्री हनुमान जी, श्री भैरव जी (अभिजीत मुहूर्त में)किया जाएगा।
16 अप्रैल 2024, मंगलवार, चैत्र शुक्ल पक्ष अष्टमी कन्यापूजन, अग्नि स्थापन, हवन श्री दुर्गासप्तशती पाठ किया जाएगा।
17 अप्रैल 2024, बुधवार, चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी हवन रुद्राष्टाध्यायी, मध्याह्न अभिजीत मुहूर्त में यज्ञ पूर्णाहुति, भण्डारा का आयोजन किया जाएगा।
श्री पीतांबरा पीठ कथा मंडप से कथा व्यास आचार्य श्री मुरारी लाल त्रिपाठी राजपुरोहित कटघोरा ने बताया कि भगवत कृपा सदैव मार्ग प्रशस्त करती है।प्रसंग के दौरान बताया कि तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी का वृत्रासुर को वरदान देना, त्वष्टा की प्रेरणा से वृत्रासुर का स्वर्ग पर आक्रमण करके अपने अधिकार में कर लेना, इन्द्र का पितामह ब्रह्मा और भगवान् शंकरके  साथ वैकुण्ठधाम जाना वृत्रासुर का देवलोक पर आक्रमण, बृहस्पति द्वारा इन्द्र की भर्त्सना करना और वृत्रासुर को अजेय बतलाना, इन्द्र की पराजय, त्वष्टा के निर्देश से वृत्रासुर का ब्रह्माजी को प्रसन्न करनेके लिये तपस्यारत होना। इन्द्राणी को बृहस्पति की शरण में जानकर नहुष का कुद्ध होना, देवताओं का नहुष को समझाना, बृहस्पति के परामर्श से इन्द्राणी का नहुष से समय माँगना, देवताओं का भगवान् विष्णु के पास जाना और विष्णु का उन्हें देवी को प्रसन्न करने के लिये अश्वमेधयज्ञ करने को कहना, बृहस्पति का शची को भगवती की आराधना करने को कहना, शची की आराधना से प्रसन्न होकर देवी का प्रकट होना और शचीको इन्द्र का दर्शन होना, शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्र का शचीको सलाह देना कि वह नहुष से ऋषियों द्वारा वहन की जा रही पालकी में आनेको कहे, नहुष का ऋषियों द्वारा वहन की जा रही पालकी में सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना आदि प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया गया..

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