स्वतंत्र अवाज विशेष
निजात को मुंह चिढ़ाते चखना सेंटर.. गैरों से ज्यादा अपनो से खतरा.. यहां खुदा है वहां खुदा है जहां देखो वहां खुदा है.. मुंह मियां मिठ्ठू की आदत से मजबूर नेतागिरी..
बिलासपुर जिले में इन दिनों कानूनी व्यवस्था से लेकर राजनीतिक मजबूरियां और आपसी माथा फोड़ के किस्सों के चर्चे गली-गली, चौक चौराहे, चाय, पान की गुमटियों और शहर की समझ रखने वाले लोगों के जमघट में रोजाना हो रही है.. प्रदेश में चुनाव को लेकर कुछ महीनों का वक्त बचा हुआ है ऐसे में हर कोई राजनीतिक और कानून व्यवस्था को लेकर अपनी राय खुलकर रखता नजर आ रहा है और शहर के कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण विषयों को लेकर स्वतंत्र आवाज़ चर्चा गली गली के इस अंक में आपके सामने आया है..
निजात को मुंह चिढ़ाते चखना सेंटर
बिलासपुर की कानून व्यवस्था बीते कुछ महीनों में एक बार फिर से बिगड़ती नजर आ रही है ऐसा नहीं है कि पुलिस हाथ पर हाथ रखे बैठी हुई है लेकिन केवल निजात अभियान और उस पर भी निजात को धंधा बना लेने और (जुआ, सट्टा, कबाड़ी, चोरी) जैसे अपराधों को फोकस न होने की वजह से अपराध का ग्राफ बढ़ता जा रहा है बिलासपुर पुलिस के पुलिस कप्तान द्वारा नशे को रोकने का प्रयास बहुत ही सराहनीय है लेकिन शहर और जिले में शराब दुकानों के पास स्थित चखना सेंटरो में खुलेआम महफिल जमा कर बैठे शराबियों को देखकर निजात अभियान के विषय पर सोचने को मजबूर कर देता है कि, इन पर लगाम क्यों नहीं लगाई जा रही है हालांकि राजनीतिक सरपरस्ती और मलाई की मिठास की वजह से थानेदार अपनी टीम को लेकर चखना सेंटरो तक पहुंचने के लिए कतराते नजर आते हैं.. खुलेआम लॉ एंड ऑर्डर की उड़ती धज्जियो के बीच आबकारी के क्षेत्र निरीक्षकों का जलवा देखते ही बनता है हर चखना सेंटर से रोजाना की कमाई ने आबकारी विभाग को शोले फिल्म के ठाकुर की तरह बना दिया है, निजात अभियान के तहत इन चखना सेंटरो और आसपास नियमों की धज्जियां उड़ाते नशेड़ियों पर कार्रवाई न होना सवाल पैदा करता है..
गैरों से ज्यादा अपनों से खतरा
छत्तीसगढ़ का राजनीतिक परिदृश्य पिछले कुछ समय में इस तरह बदला है कि हर राजनीतिक व्यक्तित्व ऐसा कहता नजर आ रहा है कि गैरों की अपेक्षा यहां तो अपनों से ज्यादा खतरा है.. राजनितिक रूप वर्चस्व की लड़ाई से आगे बढ़कर जुनून की लड़ाई तक अमादा युवा राजनीतिक सरपरस्ती के इस तरह मोहरे बन चुके हैं कि, पार्टी को ही पलीता लगाने से पीछे नहीं हट रहे हैं.. पिछले कुछ सालों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता विचारों की लड़ाई से हटकर खूनी संघर्ष तक पहुंच चुकी है बिलासपुर जिले में एक ही संगठन के अलग-अलग गुटों और नेताओं के पक्षों में होती खूनी संघर्ष इस बात का जीता जागता सबूत है कि वर्चस्व की लड़ाई में राजनीतिक सेवा कहीं पीछे छूट चुकी है, राजनीतिक दल से आगे बढ़कर गैंग का रूप लेते लोग जनकल्याण जनता के हित से जुड़े नजर नहीं आते बल्कि अपनी गैंग को बड़ा बना कर राजनीतिक सरपरस्ती में खुद को बॉस साबित करने का जूनून नजर आता है..
यहां खुदा है वहां खुदा है जहां देखो वहां खुदा है
बिलासपुर शहर वैसे तो स्मार्ट सिटी की तर्ज पर स्मार्ट बनने की कोशिश कर रहा है लेकिन स्मार्ट अधिकारियों का शहर खोदापुर के नाम से अभी-अभी प्रसिद्ध हो चुका है, बिलासपुर नगर निगम के अधिकारियों का सबसे मनपसंद काम एक बार फिर बिलासपुर वासियों के लिए सर दर्द बनता जा रहा है चौक चौराहों पर नाले बनाने की जद्दोजहद एक साथ शुरू हुई और अब तक पूरी ना हो सकी है, यहां खुदा है वहां खुदा है जहां देखो वहां खुदा अगर जहां नहीं खुदा वहां कल खुद जाएगा के मंत्र को लेकर आगे बढ़ने वाले बिलासपुर नगर निगम की खुदाई का शौक एक बार फिर जाग उठा है और नाले बनाने के नाम से सभी मुख्य चौक चौराहों को खो दिया गया है वो तो शुक्र है मानसून का, कि अब तक बादल काले होकर बरसना शुरू नहीं हुए हैं वरना 15 जून के बाद मानसून का आगमन प्रदेश में हो जाता है और बिलासपुर जलभराव के संकट से जूझने लगता है जलभराव के संकट को दूर करने नगर निगम में पुराना बस स्टैंड चौक महामाया चौक और सत्यम चौक के पास नाले के चौड़ीकरण का काम तो शुरू किया है लेकिन अपने चिर परिचित अंदाज के साथ काम को लेट लतीफ कर बिलासपुर वासियों की तकलीफों को बढ़ाने में भी कोई कमी नहीं छोड़ रहा है.. मुख्य चौक चौराहों के खुदाई से यातायात भी बुरी तरह बाधित हो रहा है ऐसे में अगर आने वाले कुछ दिनों में बरसात आ गई और काम पुरा न हुआ तो मुसीबते बढ़ने के साथ-साथ इन जगहों से गुजरना जान के लिए खतरा भी पैदा कर सकता है..
मुंह मियां मिठ्ठू की आदत से मजबूर नेतागिरी
राजनीति में कभी भी नेता अपने धरातल से अलग नहीं होता है, क्योंकि राजनीतिक पृष्ठभूमि गली चौक चौराहों मोहल्ले से होकर गुजरती है लेकिन बदलते राजनीतिक परिवेश में मुंह मियां मिट्ठू और मक्खन लगवाकर खुश होने नेताओं की भीड़ से एकत्रित होनी शुरू हो गई है.. छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव को चंद महीनों का वक्त बाकी है ऐसे में राजनीतिक पार्टियां जिताऊ कैंडिडेट की तलाश में दिन-रात एक करती नजर आ रही है वही हर विधानसभा में नेता अपनी पार्टी से आगे बढ़ कर खुद को प्रत्याशी घोषित करने और जनता का हितैषी बताने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं.. नहीं-नहीं पार्टियों के नए नवेले नेताओं द्वारा मुंह मियां मिट्ठू नीति अपनाकर खुद को जन नेता साबित करने की कोशिश की जा रही है हालांकि ऐसे नेताओं को शहर के पुरानी गलियों, चौक चौराहों और यहां रहने वाले लोगों से लेकर गलियों के राजनीतिक समीकरण का अंदाजा तक नहीं है लेकिन पोस्टर लगाकर खुद को जननेता बताने का दंभ भरने वाले नेताओं पर हंसी ठिठोली करने वालों की जमघट चाय और पान ठेलो में लगती नजर आ रही है, यात्रा के नाम पर सीधी सड़क नापने वाले नेताओं को भले ही जनता के मुद्दों से कोई सरोकार न हो और ना ही क्षेत्रानुसार जनता की जरूरतों का पता हो लेकिन ढोल पीटकर पर्चे बांटकर जरूर राजनीतिक ढकोसले बाजी की जा रही है.. कुछ नेता तो ऐसे भी हैं जो खुद को विधायक प्रत्याशी घोषित कर चुके थे जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने आपत्ति जताई तो उनके द्वारा विधानसभा प्रत्याशी ठप्पा हटा दिया गया.. लेकिन हालत यह है कि कुछ महीने पहले साथ बैनर पोस्टर में छाए रहने वाले बेचारे नेता धीरे-धीरे शहर के बैनर फोटो से गायब हो गए हैं आजकल तो उन्हें पार्टी के पदाधिकारियों द्वारा किए जाने वाले कार्यक्रमों में पूछा तक नहीं जाता है प्रदेश में बड़ा पद लेकर भी ऐसे कुछ नेता अपने पार्टियों के धरातल से कटे हुए नजर आते हैं स्टेशन के बाहर बड़े बैनर पोस्टर के सहारे अपनी राजनीतिक नैया के खेवैया बनने की कोशिश कितनी कारगर होगी यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा.. लेकिन मुख्यधारा की पार्टियों के वर्तमान विधायक और पूर्व विधायक के सामने आना शायद इनके लिए संभव ही ना हो, क्योंकि वर्तमान विधायक के व्यवहार और काम से बिलासपुर संतुष्ट नजर आ रहा है अपनी अलग पहचान और वर्चस्व बनाने वाले विधायक को टक्कर देना टेढ़ी खीर होगी.. राजनीति को समझने से पहले इन्होंने खुद को धरातल और जनता से बड़ा समझने की गलती कर बैठते हैं और ऐसे नेताओं के हर पंचवर्षीय में आने और जाने की फेहरिस्त भी लंबी रहती है..
✍️ रविंद्र विश्वकर्मा ✍️



