स्वतंत्र आवाज़ विशेष- भारत का राष्ट्रीय ध्वज: इतनी बार बदला स्वरूप, जानिए तिरंगे का इतिहास.. पहली बार बनने से लेकर आज के डिजाइन तक की पूरी कहानी..

डेस्क- भारत अपनी स्वाधीनता के 79वें गौरवशाली वर्ष को पूरी उल्लास के मना रहा है, आधुनिक भारत विरासत और संस्कृति को समेटे विकास की राह पर सरपट दौड़ने वाला देश विश्व में सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ साथ सबसे बड़ी आबादी और विश्व में संप्रभुता का नेतृत्व भी करता है, गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए स्वतंत्रता के यज्ञ में लाखों आहुतियां देने के बाद स्वाधीनता का फल मिला, और इसी आजादी के पावन पर्व पर स्वतंत्र आवाज़ अगले 17 अगस्त तक आजादी और संविधान से जुड़ी कई रोचक जानकारियां लेकर आयेगा ताकि उन संघर्षों और जानकारियों से आप भी भलीभांति परिचित हो सकें..
पहला अंक- राष्ट्रीय ध्वज..
आज हम बड़े शान से तिरंगे को लहराता देखकर गर्व महसूस करते है, भारत का राष्ट्रीय ध्वज केवल एक पहचान नहीं, बल्कि देश की आज़ादी, गौरव और एकता का प्रतीक है.. आज हम जिस तिरंगे को देखते हैं, उसकी यात्रा 1906 से शुरू होकर 1947 में अपने मौजूदा स्वरूप तक पहुंची, इस दौरान ध्वज में कई बदलाव हुए और सात अलग-अलग रूप सामने आए..
पहला ध्वज 1906 में फहराया गया, वर्तमान तिरंगे को 22 जुलाई 1947 को मिली स्वीकृति, पिंगली वेंकैया इसके जनक माने जाते हैं..
पहला राष्ट्रीय ध्वज- पहला ध्वज 7 अगस्त 1906 को कोलकाता के पारसी बागान स्क्वायर में फहराया गया था, यह झंडा तीन क्षैतिज पट्टियों से बना था: हरा, पीला और लाल. ऊपर की हरी पट्टी में आठ कमल के फूल थे, जो भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे, बीच में पीली पट्टी पर “वंदे मातरम” लिखा था, नीचे की लाल पट्टी में सूर्य और चंद्रमा के चित्र थे, इसे सिस्टर निवेदिता द्वारा डिजाइन किया गया था..
हरे रंग पर आठ कमल के फूल
पीले रंग पर “वंदे मातरम” लिखा हुआ
लाल रंग पर सूरज और चांद का चिन्ह

दूसरा ध्वज (1907)- दूसरा भारतीय ध्वज 22 अगस्त 1907 को मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में फहराया, इस ध्वज में तीन रंगों की धारियाँ थीं, लाल, हरा और पीला, इसमें एक सूर्य और चंद्रमा के चित्र भी थे, इस ध्वज ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया, भीकाजी कामा का यह कदम भारतीय संघर्ष को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण था

1917 का ध्वज– होम रूल मूवमेंट के दौरान बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने ध्वज का एक नया स्वरूप पेश किया, इसमें लाल और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियां और बीच में यूनियन जैक का चिन्ह था, साथ ही आठ सफेद कमल के फूल बनाए गए..

1921 का ध्वज– विजयवाड़ा के कांग्रेस अधिवेशन में आंध्रप्रदेश के पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी को एक डिजाइन दिखाया.. इसमें लाल, हरा और बीच में सफेद रंग पर चरखा था, गांधीजी ने सफेद रंग जोड़कर सभी के लिए जगह बनाई..

1931 का ध्वज– 1931 में ध्वज को फिर बदला गया, यह आज के तिरंगे के काफी करीब था—
केसरिया, सफेद और हरा तीन पट्टियां, बीच में चरखा, यह “स्वराज ध्वज” कहलाया..

वर्तमान तिरंगा 1947– 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने मौजूदा तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया.. डिजाइन पिंगली वेंकैया का था, जिसमें बीच के चरखे की जगह अशोक चक्र रखा गया.. अशोक चक्र में 24 तीलियां हैं, जो निरंतर प्रगति और कानून के पहिये का प्रतीक हैं..

ध्वज का आकार और अनुपात..
राष्ट्रीय ध्वज की लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 3:2 है.. अशोक चक्र का व्यास, सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है..
रंगों का अर्थ
केसरिया: साहस और बलिदान का प्रतीक
सफेद: शांति और सत्य का प्रतीक
हरा: विश्वास, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक
अशोक चक्र: जीवन में गति और निरंतरता का प्रतीक
रोचक तथ्य– तिरंगा केवल खादी से ही बनाया जा सकता है, यह नियम भारतीय मानक ब्यूरो ने तय किया है.. इसे फहराने और इस्तेमाल करने के नियम 2002 में आम जनता के लिए संशोधित किए गए.. ध्वज का अपमान या गलत इस्तेमाल करने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है..
राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े अतिरिक्त तथ्य..
पहला सार्वजनिक फहराना– 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रीय ध्वज प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली के लाल किले पर फहराया था..
खादी का नियम– भारतीय ध्वज केवल हाथ से बुनी हुई खादी (कपास, ऊन या रेशम) से ही बनाया जा सकता है।
इसे बनाने का अधिकार केवल ध्वज निर्माण समिति द्वारा मान्यता प्राप्त इकाइयों को है, जिसमें सबसे प्रसिद्ध कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग समिति है।
अशोक चक्र की प्रेरणा– अशोक चक्र का डिज़ाइन सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के सिंह स्तंभ के चक्र से लिया गया है। इसमें 24 तीलियां होती हैं, जो दिन के 24 घंटे और निरंतर गति का प्रतीक हैं।
फहराने के नियम- 2002 में नियमों में बदलाव कर आम नागरिकों को भी हर दिन तिरंगा फहराने की अनुमति दी गई।
ध्वज को सूर्यास्त के बाद नहीं फहराना चाहिए, सिवाय विशेष प्रकाश व्यवस्था होने पर।
ध्वज जमीन को नहीं छूना चाहिए और किसी भी हालत में फटा या गंदा नहीं होना चाहिए।
सबसे ऊँचा तिरंगा-
भारत का सबसे ऊँचा राष्ट्रीय ध्वज पंजाब के अटारी बॉर्डर पर फहराया गया है, जिसकी ऊँचाई 360 फीट है।
तिरंगे का उल्टा फहराना-
यदि तिरंगे का केसरिया रंग नीचे और हरा ऊपर हो जाए तो यह राष्ट्रीय अपमान माना जाता है।
पहला ध्वज निर्माण-
स्वतंत्र भारत के पहले आधिकारिक तिरंगे का निर्माण हुबली, कर्नाटक में हुआ था..
सूचना- यह खबर अलग अलग स्थानों से एकत्रित कर बनाई गई है इसमें परिवर्तन होना भी संभव है..



