स्वतंत्र अवाज विशेष
चर्चा गली गली- सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का.. राजनीति की प्रतंचा में नवसीखिए के उल्टे दांव पेच.. महामारी के बाद बेपटरी हो चुकी छुक छुक गाड़ी..
1. सैया भए कोतवाल…
वैसे बिलासपुर शहर क्या जिले में कानून व्यवस्था में कसावट लाने के मकसद से ही जिले के पुलिस कप्तान के द्वारा सबसे पहले नशे पर अंकुश लगाने निजात अभियान छेड़ा गया.. चाकूबाजी से लेकर छोटी छोटी सी बातों पर होने वाली घटनाओं पर ब्रेक भी लगा.. ये अलग बात है कि कसावट की रस्सी में कुछ दुकानदार है जिन्हें नियमो को छूट दे दी गयी है.. हालात ये है कि किराना और बेकरी जैसी दुकानों में नशे के समान के अलावा बियर धड़ल्ले से बिक रही है.. इसे पुलिस की आंखों में धूल झोखना कतई न समझे, दरअसल ऐसे लोग पुलिस के कृपा पात्र बने है इसलिये बेकरी, किराना दुकानों में बीयर की बोतल बड़ी आसानी से मिल रही है.. पुलिस के कृपा पात्र बने ऐसे लोगो की वजह से ही पुलिस के कसावट वाले अभियानों को धक्का भी लग रहा है.. जिले के कप्तान के द्वारा गांव गली, मोहल्लों में नशे के विरुद्ध चल रही पाठ शाला से नशेड़ियों और उत्पात मचाने वालो की ऐसी क्लास लगी है कि उनका नशा चूर हो गया है.. लेकिन राजनीतिक रसूख रखने वाले कुछ सफेद कुर्ता पजामा धारी जो जो हमेशा जीन्स और टी शर्ट में ही नजर आते है केवल अपने आला नेताओ से नजदीकी बढ़ाने वाले या नेतागिरी की आड़ में अपना ख़ौफ़ दिखाने वाले नेता टाइप के लोगो की वजह से पुलिस के द्वारा कायम की जा रही शांति व्यवस्था पर खलल पड़ता है.. हालांकि दबंगई दिखाने वाले ऐसे लोगो का जब तब सड़को पर जुलूस निकालकर पुलिस उनकी रंगदारी के रंग को फीका कर रही है लेकिन क्या करें न्यायधानी को मेट्रो सिटी का रंग जो चढ़ रहा है.. तो ऐसे में पुलिस भी करे तो क्या करे.. हर काम पुलिस करे…इस मानसिकता को तोड़कर ये समझने की जरूरत है कि शहर हम सबका है तो शांति, सुकून और अमन चैन कायम करना हम सबकी जिम्मेदारी है.. जरूरत इस बात की भी है कि रिश्तेदारी का आड़ दिखाकर व्यापार की दुकान चला रहे ऐसे लोगो के खिलाफ भी पुलिस को सख्त रहना चाहिए क्योंकि नियम सबके लिए बराबर है.. इस बात का ख्याल रखते हुए अगर कानून का डंडा चकेगा तो निश्चित तौर पर न्यायधानी में शांति कायम रहेगी.. नही तो पुलिस के लिए आये दिन सरदर्द बनने वाले गुंडों के लिए फिर चाहे कोई भी झंडुबाम लगा ले सिरदर्द कम नही होगा..
2. नेतागिरी एक ऐसी भी..
चुनावी साल है.. इसलिए चुनावी रंगत की खुमारी अब धीरे धीरे राजधानी से लेकर न्यायधानी तक मे दिखाई देने लगी है.. हालांकि अभी चुनावी मौसम की गर्मी के पारे की तपिश थोड़ा दूर है.. लेकिन जनाधार का ग्राफ अपने अपने पक्ष में करने के लिए राजनीतिक दल बैसाख और जेठ की दोपहरी में पसीना बहाते नजर आ रहे है.. कही पर सत्ता पक्ष विपक्ष पर हमलावर है तो कही विपक्ष मुद्दों के बहाने सत्ता पक्ष को घेर रहा है.. चुनावी मोहरों की विसात बिछने की तैयारी है.. इन सबके बीच साढ़े चार सालों तक जो दल नजर नही आये है अब वे भी नजर आ रहे है.. कुछ तो ऐसे भी जिनकी नींव भले ही पंजाब और दिल्ली में तैयार हो गयी हो.. लेकिन छत्तीसगढ़ में जमीन तलाशने की तैयारी दल ने शुरू कर दी है.. न्यायधानी में दल की कमान तो वैसे कई परिचित चिरपरिचित चेहरे संभाले हुए है.. पार्टी के कुछ चेहरे ऐसे है जो जमीनीस्तर पर मुद्दों को तलाश कर जनता के बीच अपनी पैठ बनाने में लगे है तो कुछ ऐसे है जिन्हें न संगठन की फिक्र है न पार्टी के नियमो की और न ही पार्टी के आला नेताओ की.. सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए कार्यकर्ताओ से लेकर संगठन को हासिये में रखने वाली महिला नेत्री अकेले ही राजनीति का डंका बजाने के लिए जब तक निकलती है.. बैनर पोस्टर में सिर्फ अपना बड़ा सा फ़ोटो छपवाकर राजनीति के मैदान में किस्मत आजमाने के लिए उतरी महिला नेत्री पार्टी के द्वारा दिये गए पद को बताने से भी परहेज करती है.. ऐसे में भला उनकी राजनीति की दिशा और दशा कैसे तय होगी.. किसी की भी समझ से परे है.. अभी पार्टी ने न ही उम्मीदवार तय किया है और न ही कोई कार्यक्रम.. लेकिन नेत्री महोदया को इतनी जल्दी है कि बिना जिला संगठन के पदयात्रा भी निकाल दी.. हालांकि ये पदयात्रा कम जनसम्पर्क ज्यादा दिखाई दिया ठीक उस अंदाज में जैसे चुनाव के समय उम्मीदवार घर घर दस्तक देता है.. मुट्ठी भर खरीदी हुई भीड़ के सहारे इनके जनाधार की नैया पार लगेगी या फिर..?
वैसे पार्टी को दरकिनार कर एकला चलो की नीति का पहाड़ा पढ़कर आगे बढ़ने वाली नेत्री महोदया के चर्चे गली गली तो है ही उनके साथ साथ उनके शौहर भी कम सुर्खियां नही बटोर रहे है.. सेंट्रल नौकरी के रुतबे के बीच साहब नॉकरी सेवा की शर्तों को ताक पर रखकर पत्नीधर्म निभाने में लग जाते है.. राजनीतिक कार्यक्रमो की रूपरेखा उन्ही के इशारे पर तय होती है.. यानी सारा मैनेजमेंट सरकारी साहब की मेहरबानी पर.. कई बार तो ये सरकारी साहब खुले तौर पर राजनीतिक कार्यक्रम शिरकत करते नजर आ जाते है.. खैर राजनीति में एक दूसरे को दरकिनार कर आगे बढ़ने की पम्परा चाहे छोटे दल हो या बड़े दल सभी मे नजर आते है.. अब जमीन तलाश रहे इस दल में भी ये अकेले ही चले है राजनीति का डंका बजाने..
इन दिनों राजनीतिक गलियारे में एक राजनीतिक पार्टी की जमकर चर्चा हो रही है …न ही उम्मीदवार तय हुआ है और न ही चुनाव है.. लेकिन पदयात्रा के बहाने एक नेत्री पोस्टर पम्पलेट बांटकर अपना जनाधार मजबूत करने में लग गयी है.. और उनके मिस्टर जो है सरकारी नॉकरी में रहकर पंपलेट बांटकर पत्नी धर्म का कर्तव्य निभा रहे है..
3. आधुनिकीकरण की रेल यात्रा ?
आजादी के इतने सालों के बीच ये पहली दफा हुआ जब कोरोना के बाद से यात्री ट्रेनें लोगो के लिए आरामदायक यात्रा कष्टदायक यात्रा बनी.. बीते दो सालों के दौरान रेल यात्रियों ने स्टेशन में “आपकी यात्रा सफल हो” कि जगह यही सुना.. कृपया ध्यान दीजिए.. आधुनिकीकरण के काम की वजह से यात्री ट्रेनों को एक महीने के लिए बन्द किया जा रहा है.. ये सुनते सुनते डेढ़ से दो साल तक यात्रियों ने यही सुना और वैक्यूम ब्रेक की तरह झटके खाते रहे.. दक्षिण पूर्व मध्य रेल से लेकर मध्य रेल सहित जितने भी मंडल है सभी मे आधुनिकीकरण का काम किया गया.. इतना जरूर है कि इस अधुनिकीकरण के बीच पवार सेक्टरों को बेरोकटोक कोयले की आपूर्ति की जाती रही.. खैर लोग ये संतोष करते रहे कि आने वाले दिनों में सुगम और अच्छी रेल यात्रा रेलवे रेल यात्रियों को देगा.. लेकिन दो दिन पहले ओडिसा के बालासोर में जो भयावह रेल हादसा हुआ उसने कई सारे सवाल खड़े कर दिए.. रात के अंधेरे को चीरती ट्रेन जब अपनी स्पीड से दौड़ रही थी.. यात्री नींद के आगोश में अपने मुकाम तक पहुचने का इतंजार ही कर रहे थे कि रात वक़्त हुई इस घटना ने सैकड़ो यात्रियों को मौत की नींद सुला दिया.. जिनका सफर अगले स्टेशन में खत्म होने वाला था.. वे अगले स्टेशन के आने के पहले ही इस दुनियां से विदा हो गए.. उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने सुखद और आरामदायक यात्रा का टिकट लिया था.. लेकिन कौन कहा ट्रेन की बोगी में दम तोड़ता रहा, बच्चे मम्मी पापा चिल्लाते, तो पापा मम्मी बेटे और बेटी को आवाज देते खामोश हो गए.. रात के अंधेरे में चीख पुकार, करुण कृन्दन प्रत्यक्षदर्शियों को झकझोरता रहा और जीवन भर उन्हें ये भयावह क्षण कई राते उन्हें परेशान करता रहेगा.. घटना के बाद रेल ट्रैक पर बने श्मशान पर आंसू बहाने चेहरे दिखाने के लिए लोग पहुँचते रहे.. दोषियों पर कड़ी कार्यवाई का तसल्ली वाला मरहम ग़मज़दा लोगो पर लगा दिया गया और चले गए.. कुछ दिनों के बाद मौत के सन्नाटे की तरह सब कुछ शांत हो जाएगा.. लेकिन सैकड़ो लोगो को मौत की नींद सुलाने वाला ये हादसा एक ही सवाल करता रहेगा क्या यही आधुनिकीकरण की रेल यात्रा ?
स्वतंत्र आवाज के लिए विनोद कुशवाहा



